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Friday, 19 July 2013

१० चौहान राजवंश कोटा और 11 गागरोण राज्य

१० कोटा राज्य :- बूंदी राव समरसिंह के पुत्र जैत्रसिंह ने भीलों से कोटा का क्षेत्र छीना | कर्नल टॉड ने लिखा है की कोटिया नामक भीलों की ऐक जाती के नाम कोटा का नाम करण हुआ | जैत्रसिंह के समय से कोटा का राज्य बूंदी के अधीन चला आ रहा है था | शाहजहाँ के समय बूंदी राव रतनसिंह के पुत्र माधोसिंह ने शोर्यपूर्ण कार्य किये | अतः शाहजहाँ ने माधोसिंह को वि.सं.१६८८ में कोटा का स्वतन्त्र राज्य दिया | तब से कोटा राज्य बूंदी राज्य से अलग हुआ | शाहजहाँ ने इसी समय माधोसिंह को ढाई हजार सात व डेढ़ हजार सवार का मनसब भी प्रदान किया |
माधोसिंह ने खानेजहाँ के विद्रोह को दबाने में बादशाह की बहुत सहायता की | इसके फलस्वरूप उन्हें जागीर में कई परगने मिले | जुझारसिंह बुंदेला के विद्रोह को दबाने में भी उनका महत्वपूरण योगदान रहा था | उन्होंने मध्य एशियाई मोर्चों पर रहकर भी शाहजहाँ की बड़ी मदद की | शाहजहाँ ने उनका मनसब पांच हजार जात व् ढाई हजार सवार तक कर दिया हे | वे वीर योद्धा व् कुशल शासक थे | माधोसिंह की म्रत्यु होने पर उनके पुत्र मुकुन्दसिंह वि.सं.१७०५ में कोटा शासक बने | बादशाह ने उन्हें तीन हजार जात व् दो हजार सवार का मनसब दिया | इन्होने बादशाह के पक्ष में मालवा ,दक्षिण प्रदेश ,चितोड़ आदी के युद्धों में महत्वपूरण सहयोग दिया | शाहजहाँ के पुत्रों में हुए उतराधिकार युद्ध में जसवंतसिंह जोधपुर के साथ घरमत (वि.१७१५ ) के युद्ध में ओरंगजेब के विरुद्ध लड़े | ओरंगजेब पर तोपखानों से आक्रमण करने के समय अद्भुत शोर्य दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए |
ओरंगजेब शाहजहाँ के पक्ष के राजपूतों को भी अपनी और रखना चाहता था | अतः स्वयं के बादशाह बन जाने पर मुकुन्दसिंह के पुत्र जगतसिंह को बुलाकर दो हजार का मनसब दिया | जगतसिंह ने भी खजवा युद्ध (शूजा के विरुद्ध युद्ध ),बीजापुर ,गोलकुंडा तथा मराठों से विरुद्ध हुए युद्धों में ओरंगजेब के पक्ष में तलवार बजायी |ओरंगजेब द्वारा कोटा के मंदिरों तोड़ने की सुचना मिलने पर उन्होंने वियजराज को सूचित कर दिया |
जगतसिंह के बाद किशोरसिंह शासक हुए | इन्होने भी ओरंगजेब के पक्ष में बदख्सा ,धरमत आदी युद्धों में भाग लिया | ओरंगजेब द्वारा उनको तीन हजार मनसब दिया गया | उन्होंने बीजापुर तथा हेदराबाद के घेरे में वीरता का परिचय दिया | जगतसिंह के बाद रामसिंह शासक हुए | ओरंगजेब के पुत्रों में हुए उतराधिकार युद्ध में उन्होंने आजम का पक्ष लिया | रामसिंह ने १७६४ वि.के जाजव के युद्ध में वीरगति पायी |
रामसिंह के बाद भीमसिंह कोटा शासक हुए | इनके काल में कोटा की काफी प्रगति हुयी | यह सैयद बंधुओं के पक्ष में लड़ते हुए काम आये | इनके बाद उनके भाई दुर्जनशाल गद्धी पर बैठे | उन्होंने दिल्ली के गोबधिकों तथा नगर कोतवाल को मारकर गायों की प्राण रक्षा की | इनके बाद क्रमशः अजीतसिंह ,शत्रुशाल ,गुमानसिंह ,उम्मेदसिंह व केशरसिंह ११ कोटा के शासक हुए | किशोरसिंह अंग्रेजी सता के विरुद्ध थे | मांगरोल के रणभूमि में उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध किया | कोटा राज्य की स्वतंत्रता के लिए स्वयं ने सेना का नेतृत्व किया | किशोरसिंह के भाई बंधुओं ने मिलकर कम्पनी सेना का विचलित कर दिया | इनके हाथों लेफ्टिनेंट रोड मारे गये | किशोरसिंह के बाद रामसिंह ११ कोटा के शासक हुए | इनके बाद क्रमशः शत्रुशाल ११ उम्मेदसिंह ११ व् भीमसिंह कोटा के शासक रहे | देश की स्वतंत्रता के समय के समय भीमसिंह कोटा के शासक थे |

कोटा राजवंश
१.माधोसिंह (१६३१-१६४९)
२.मुकुन्दसिंह (१६४९-१६५८)
३.जगतसिंह (१६५८-१६८३)
४.प्रेमसिंह (कोयला )(१६८३-१६८४)
५.किशोरसिंह १ (१६८४-१६९६)
६.रामसिंह (१६९६-१७०७)
७.भीमसिंह (१७०७-१७२०)
८.अर्जुनसिंह (१७२७-१७५६)
9.दुर्जनशाल (१७२७-१७४८)
१०.अजीतसिंह (१७५६-१७५८)
११.शत्रुशाल (१७५८-१७६४)
१२.गुमानसिंह (१७६४-१७७१)
१३.उम्मेदसिंह (१७७१-१८१९)
१४.किशोरसिंह ११(१८१९-१८२७)
१५.रामसिंह ११.(१८२७-१८६५)
१६.शत्रुशाल ११(१८६५-१८८८)
१७.उम्मेदसिंह ११.(१८८८-१९४०)
१८. भीमसिंह (१९४०-       )
११.गागरोण राज्य :- गागरोण (कोटा )खिंची चौहानों का राज्य था | खिंचीयों का स्थान जायल जिला (नागौर )रहा है | लक्ष्मण नाडोल के पुत्र आसराज (अश्वपाल ,अधिराज )के पुत्र माणीकराव हुए  माणीक के बाद क्रमश अजबराव ,चन्दरा ,लखनराव ,गोयदराव ,संगमराव व् सामंत गुदलराव हुए | गुदलराव प्रथ्वीराज चौहान ११ अजमेर के सामंत थे | प्रथ्वीराज से किसी बात पर अनबन हो जाने के कारण गुंदलराव को जायल क्षेत्र छोडकर मालवा आना पड़ा | वहाँ डोडियो राजपूतों का राज्य था | गुदलराव का पुत्र आनल का विवाह डोडियो के यहाँ हुया था | आनल का पुत्र देवन (धारु )हुया | धारु ने अपनी सूझ -बूझ से बिजलदेव डोडियो से गागरोण हस्तगत किया | धारु का वंशज अचलदास खींची बड़े पराक्रमी शासक थे | खेरला के नरसिंही तथा होशंग शाहू (मालवा )ने अचलदास पर आक्रमण किया | अचलदास पर आक्रमण किया | अचलदास वीरता से लड़ते हुये युद्ध भूमि मे काम आए | यह घटना वी।सं॰१४८० के लगभग की है | सुल्तान ने गागरोण गजनीखान को दे दिया था |
धारु से अचलदास तक कितनी पीढ़ियाँ हुयी निश्चिंत नहीं कहा जा सकता है पर डा॰ शंभूसिंह मनोहर ने अचलदास खींची री बचानिका का सम्पादन लिखा है | धारु ,से आगे क्रमश चंद्रपाल ,सांगपाल,विजयपाल ,रत्नसिंह ,मलयसिंह ,जैत्रसिंह ,सादन सिंह ,सांवतसिंह ,क्रोधसिंह (कड़ुवाराव ) पीपाजी हुये | पीपाजी प्रसिद्ध संत हुये | आज भी इनके भक्तजन उन्हे याद करते है | इनके कोई पुत्र नहीं था |
अतः कल्याणराव गोद आए | कल्याणराव के भोजराज व भोजराज के अचलदास हुये | उनके पुत्र चाचिगदेव ,कान्ह ,उदयसिंह ,पाल्हण व गजसिंह हुये | अचलदास के पुत्र पाल्हण बड़े वीर हुये | इनके समय मे मालवा के महमूद खिलजी का आक्रमण हुया | गागरोण पर मुसलमानो का अधिकार हो गया | ओर सुल्तान ने इस दुर्ग को बदरखान को दे दिया | वि॰ सं॰ 1494 मे कुंभा ने मालवा के सुल्तान को हराया ओर गागरोण अचलदास के पुत्र पाल्हण सिंह को दिया परंतु 1520 के करीब मालवा के सुल्तान ने गागरोण पर फिर अधिकार कर लिया | प्रहलादन सिंह ने भी वीरगति पायी | खींची चौहानों का यह क्षेत्र खींचीवाड़ा कहलाता था अचलदास के पुत्र गजसिंह ने यू पी मे गाजीपुर असोथर राज्य कायम किया | इस राज्य के भगवतराय खींची बड़े वीर हुये है |
बादशाह अकबर के समय अचलदास के वंशज रायसल गागरोंन पर शासन कर रहे थे | अकबर ने मानसिंह आमेर के नेत्रत्व पर गागरोंन पर सेना भेजी | रायसल खींची को पराजय स्वीकार करनी पड़ी इसके बाद गागरोंन प्रथ्वीराज कल्याणमलोत बीकानेर को दी गयी | प्रथ्वीराज व खिंचियों की फिर लड़ाई हुयी | प्रथ्वीराज युद्ध जीते | परंतु खिंचियों ने संघर्ष जारी रखा | जहाँगीर ने गागरोण राव रतन हाड़ा को दे दिया पर खींची हाड़ों से भी युद्ध करते रहे अंत मे गागरोण पर भीमसिंघ कोटा का अधिकार हो गया | इसके बाद खींची चौहानों ने मध्य प्रदेश खिलची पुर राज्य स्थापित किया जो देश की स्वतन्त्रता तक उनही के अधिकार मे था | अचलदास के पुत्र प्रहलादनसिंह ने भीलों से चांपानेर छीन लिया था | उनकी म्र्त्यु के बाद अचलदास के पोतरा (उदयसिंह ) के पुत्र ) जयसिंह का चांपानेर पर अधिकार हो गया था | महमूद बेगड़ा ने जब चांपानेर पर आक्रमण किया तब वहाँ जयसिंह खींची शासन कर रहे थे | जयसिंह के वंशज रायसिंघ के दो पुत्र प्रथुराज व डूंगरसिंघ थे | प्रथुराज की कई पीढ़ियों बाद बाजीरावल हुये | उनको छोटे उदयपुर का राज्य मिला | डूंगरसिंघ के बाद क्रमश उदयसिंह ,रायसिंघ ,विजयसिंह ,मानसिंह ,व प्रथुराज हुये | प्रथुराज ने बारिया पर अधिकार किया | गुजरात मे खींची चौहानों के छोटा उदयपुर व बारीया देश का स्वतंत्र तब बने रहे |

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