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Sunday, 28 July 2013

चौहानों की खापें 14 हाड़ा चौहान का सम्पूरण विवरण और उनकी 31 साखाये

14 हाड़ा चौहान :- हाड़ा चौहानों की प्रसिद्ध खाप हे | नेणसी ने अपनी ख्यात में लिखा हे की आसराज नाडोल ( ११६७ -११७२ ) के पुत्र माणकराव के बाद सम्भराणस ,जैतराव ,अनगराव ,कुंतसी ,विजयपाल व् हाड़ा हुए | इन्ही हाड़ा के वंशज चौहान हाड़ा आगे चलकर कहलाये |
कर्नल टाड ने लिखा हे माणकराव के वंश में प्रसिद्द विसल हुआ | हाड़ा वंश के राजकवि गोविन्दराम के राज्ग्रंथ के आधार पर टाड ने आगे लिखा हे | विसलदेव के लड़के अनुराग से हाड़ा वंश की उत्पति हुयी | कजलीवन के बर्बरों ने असीरगढ़ गवलकुंडा पर आक्रमण किया | असी का राजा अनुराग भाग गया पर उसके लड़के ने आक्रमणकारियों का मुकाबला किया | अनुराज का पुत्र अस्थिपल बहुत घायल हुआ | रणधीर चौहान की पुत्री सूराबयी ने आशापुरी देवी से आशीर्वाद से अस्थिपाल को बचाया | इस अस्थिपाल ने सन १०२५ ईस्वी में शमीर पर आक्रमण किया | अस्थिपाल के चप्द्रकरण लड़का था | उसका लोकपाल हुआ |लोकपाल के दो पुत्र थे हम्मीर व् गंभीर | ये दोनों संयोगीता की लडाई में प्रथ्वीराज के पक्ष में लड़ते हुए काम आये | हम्मीर के बाद क्रमशः कालकर्ण,महामुग्ध ,रावबाचा, व् रामचंद्र हुए | रामचंद्र के अधिकार में असीरगढ़ का दुर्ग था | अलाऊधिन खिलजी ने जब असीरगढ़ को जीत लिया तब रामचंद मारा गया | तब उसका लड़का रेनसी जो चितोड़ भेज दिया गया | रैनसी बड़ा हुआ तब उसने भैसरोड़ पर अधिकार किया | रैनसी के बाद कोनल पठार का स्वामी हुआ | कोनल के लड़के बांगा ने मैलाल पर अधिकार कर लिया और उसके पुत्र देवा ने बूंदी पर अधिकार कर लिया |
श्यामलदास जी ने माणिकराव के वंशज सोमेश्वर के पुत्र उरथ के वंशजों में भानुराज लिखा है और आगे लम्बी पीढ़ी देते हुए जोधराज ,कलीकर्ण,भवनसिंह ,कोलन ,आसूपाल,विजयपाल ,बांगा और देवा (बूंदी ) के नाम लिखे हे |वंश भास्कर में भीमचंद्र ,भानुराज ,जोधराव,केलहना,आसुपाल ,विजयपाल ,बांगा और देवा (बूंदी ) अंकित किया गया है | सुरजन चरित्र में माणकराव ,चामुंडाराव ,भीमराज ,विजयराज ,कालहन ,बंग व् देव (बूंदी ) नाम अंकित हे | मेनल शिलालेख में भाणवर्धन ,चौहान ,कुलण ,जैपाल देवराज नाम अंकित किये है |
इस सब वृतान्तो में दो बात करीब २ सभी से मिलती हे की हाड़ों का मूल माणकराव (माणकराज ) और उसका अनुराज उर्फ़ भाणवर्धन मिलता है | अनुराज उर्फ़ भाणवर्धन के आगे की वंशावली में कही कम नाम तो कही अधिक नाम मिलते है | अब यह जानना हे की भाणुराज (भाणवर्धन ) कोंसे माणकराज का वंशज था | नेणसी में माणक राज का वंशज था ? नेणसी ने माणकराज को आसराज ( ११६७-११७२ ) का पुत्र अंकित किया है किसी ने माणकराज सांभर का वंशज बताया है | टाड के व्रतांत को ठीक तरह से समझे तो सार निकलता हे की अनुराज ( अश्वराज ) ने बनवाया था वहा रहता था | महमूद गजनवी ने जब सोमनाथ पर हमला किया तब वह नाडोल से गुजरा उस समय नाडोल के शासक अहिल ने मुस्लिम सेना से टक्कर ली | तब संभतः अनुराज व् आसल कोट के साथ लक्ष्मण नाडोल के पुत्र अश्वराज के पोत्र अनुराज ( भाणवर्धन ) व् अजबराज ( खिंचियों का आदी पूर्वज ) सहित चौहानों ने मुस्लिम सेना का सामना किया | उस समय अनुराज ( भाणवर्धन ) का पुत्र अस्थिपाल बुरी तरह घायल हो गया | मालूम होता हे उसका शरीर अस्थिपंजर हि रह गया था | केवल हाड़ दिखाई देते होंगे इसी कारन दंतकथा प्रचलित हो गयी होगी की आशापुरी में अस्थिपाल के हाड़ो की में प्राण डालने के कारन उसके वंशज हाड़ा हुए पर यह सब इतिहास के तथ्यों से परे हे | संभतः चौहान रणधीर की पुत्री सूराबाई की सेवा से अस्थिपाल बचा होगा और महमूद के आगे निकल जाने के बाद चौहानों ने फिर आसलकोट ( नाडोल ) पर अधिकार कर लिया होगा | अतः यदि अनुराज माणिक्यराव सांभर के वंशज विसलदेव ( १२१० -१२२० वि.) का वंशज भी नहीं हो सकता और न केवल नाडोल के श्वराज ( ११६७-११७२) का वंशज हो सकता है
इन नामावलियों से मालूम पड़ता हे की किसी नामावली में कुछ नाम छोड़ दिए गए हे किसी में कुछ अन्य नाम छोड़ दिए गए हे | परन्तु कुछ नाम ऐसे हे जो प्रायः सभी नामावलियों में हे जैसे :- माणकराव ,अनुराज ,( भाणुराज भाणवर्धन ),कल्हण (कुंतसी ) विजयपाल ,बांगा और देवा |
इन सबकी परिमार्जीत नामवाली इस प्रकार हो सकती हे |
१ माणिकराव २.अनुराज उर्फ़ भानुराज (भाणवर्धन उर्फ़ सम्भारण) ३.अस्थिपाल ४.चन्द्रकर्ण५.लोकपाल ६.हम्मीर ७.कलीकर्ण ८.महामुग्ध 9.राववाचा १०.रामचंद 11.रैनसी १२.जैतराव 13.आसुपाल 14.विजयपाल (जैपाल ) 15.हाड़ा ( हरिराज ) 16.बांगा 17.देवा (बूंदी )
बूंदी से तीन मील दूर विजयपाल का वि.सं.१३५४ का शिलालेख मिला हे तथा मैनाल में देवा बूंदी के वंशज महादेव का शिलालेख १४४६ मिला हे | इस शिलालेख में देवा बूंदी के बाद रतपाल ,केल्ह्न ,कुतल और महादेव नाम दिए है | इससे देवा से ४ नाम और आगे जुड़ते हे | इस प्रकार 18+४ =22 नाम होते हे | ऐक पीढ़ी का २० वर्ष का समय फिर 440 वर्ष होते हे | शिलालेख का सं.वि.१४४६ -440=१००६ अनुमानित हे | अतः मानिक के पुत्र अनुराज का समय ई.सं, १०२५ वि १०८२ ठीक लगता हे | विजयपाल का शिलालेख १३५४ विक्रमी का मानिक से विजयपाल तक परिमार्जीत नामावली के 15 नाम होते हे | इस द्रष्टि से 300 वर्ष हुए | शिलालेखीय संवत १३५४-300= १०५४ वि.संवत पड़ते है | इस द्रष्टिकोण से भी मानकराव के पुत्र अनुराज का समय वि १०८२ होना संभव हे |
टाड ने लिखा हे की असीरगढ़ पर अलाऊधिन खिलजी का अद्गिकर हो जाने पर रैनसी को अपने मामा के घर चितोड़ भेजा गया | रैनसी के वंशज महिपाल का १४४६ वि.शिलालेख मिला है | तब इस द्रष्टि से रैनसी का समय १२५६ वि.में पड़ता है जो अलाऊधिन खिलजी का समय नहीं है | कुतुबुधीन का वि.१२५३ में नाडोल पर हमला हुआ और उस पर उसका अधिकार हो गया | उस समय रैनसी को अपने मामा के घर भेजा जाना उपयुक्त लगता है | मेवाड़ के पास भैसरोड में हाड़ा के पूर्वजों के आने का यही कारन समीचीन लगता है | चितोड़ से हि रैनसी या उनके उतराधिकारियों ने भैसरोड़ आदी पठारी भाग को अपने अधिकार में किया है | अलाऊधिन खिलजी के चितोड़ पर आक्रमण के समय इस पठारी भाग उनका अधिकार क्षेत्र का और विस्तार किया | इसी समय हरिराज ( हाड़ा ) ने आपने अधिकार क्षेत्र का और विस्तार किया इसी हरिराज जिसे बोलचाल की भासा में हाड़ा के पोटे देवा ने बूंदी पर भी अधिकार कर लिया | बूंदी व् कोटा हाड़ा चौहानों की बड़ी रीयास्ते थी |इन सब द्र्ष्टियो से विचार करने पर सार रूप में कहा जा सकता है की हाड़ा चौहानों का आदी पुरुष भाणवधन तो नाडोल के आसराज || (११६७-११७२) के प्रसिद्ध के कारन से मानिकराव को आसराज का पुत्र अंकित कर दिया | वस्तुत  भाणवर्धन ( भानुराज ,अनुराज या सम्भारण ) लक्षमण नाडोल के पुत्र आसराज ( अधिराज -अश्वपाल ) के पुत्र मानिकराव का पुत्र थे | इसी के वंशज हरिराज ( हाड़ा ) से हाड़ा चौहानों की उत्पत्ति हुयी |

हाड़ा चौहानों की खापें
१.धुग्धलोत :- बंगदेव के पुत्र धुग्धल के वंशज |
२.मोहनोत :- बंगदेव के पुत्र मोहन के वंशज |
३.हत्थवत :- बंगदेव के पुत्र देवा के वपुत्र हत्थ के वंशज |
४.ह्लुपोता :- देवा के पुत्र हरिराज के पुत्र हलू के वंशज हलुपोता हाड़ा कहलाये | उनकी आगे चलकर पांच शाखाएं हुयी | चचावत, कुम्भावत ,बासवत,भोजवत,और नयनवत |

५.लोहराज:- हरिराज के पुत्र लोहराज के वंशज | यह गुजरात में निवास करते हे |
६.हरपालपोता :- राव देवा के पुत्र समरसिंह के पुत्र  हरपाल के वंशज |
७.जतावत :- राव समरसिंह के वंशज |
८.खिजुरी का :- समरसिंह के पुत्र डूंगरसी को खिजुरी गाँव जागीर में मिला | इसी गाँव के नाम से खिजुरी कहलाये |
9.नवरंगपोता - समरसिंह द्दी के पुत्र नवरंग के वंशज |
१०.थारूड़ :- नवरंग के भाई थिरराज या थारूड़ के वंशज थिरराज पोता या थारुड़ कहलाये |
11.लालावत :- बूंदी के शासक नापा समरसिहोत के पुत्र हामा के पुत्र लालसी के वंशज | लोलावतों की आगे चलकर दो शाखाएं निकली ,जैतावत व् नव्ब्रहम लालसी के पुत्र थे |
१२.जाबदु:- हामा के पुत्र वीरसिंह के पुत्र जाबदु के वंशज | इनके दो साखाये हुयी  १.सांवत - जाब्दु के पुत्र सारण के पुत्र संवत के वंशज | दूसरी २. मेवावत ;- जाबदु के पुत्र सेव के पुत्र मेव के वंशज |
13.अखावत :- बदी नरेश वीरसिंह के पुत्र बैरिशाल के पुत्र अखेराज के वंशज |
14.चुण्डावत :- अखेराज के भाई चुंडा के वंशज |
15.अदावत :- अखेराज के भाई उदा के वंशज |
16.बूंदी नरबदपोता :- बूंदी शासक बैरिसाल के पुत्र राव सुभांड के पुत्र नरबद के वंशज |
17.भीमोत:- नरबद के पुत्र भीम के वंशज |
18.हमीरका :- नरबद के पुत्र पूर्ण के पुत्र हम्मीर के वंशज |
19.मोकलोत :- नरबद के पुत्र मोकल के वंशज |
२० अर्जुनोत :- नरबद के पुत्र अर्जुन के |
अर्जुनोत की शाखाएं |
१,अखेपोता :- अर्जुन के पुत्र अखे के वंशज |
२.रामका :- अर्जुन के पुत्र राम के वंशज |
३.जसा :- अर्जुन के पुत्र कांधन के पुत्र जसा के वंशज |
४ दूदा : अर्जुन के बेटे सुरजन के पुत्र दूदा के वंशज |
५.राममनोत :- दसुरजन के पुत्र रायमलोत के वंशा |

२१ .सुरतानोत:- नरबद में बड़े भाई बूंदी के राव नारायण के पुत्र सूर्यमल के पुत्र सुरतान के वंशज |
22 हरदाउत: सुरजन के बड़े पुत्र राव भेज के पुत्र हर्द्यनारायण के वंशज | कोटा राज्य में करवाड़ ,गेंता ,पूसोद ,पीपला ,हरदाउतो के ठिकाने थे | इनको हरदाउट कोटडिया कहा जाता है |
23.भेजावत:- राव भेज के पुत्र केशवदास को ढीपरि सहित 27 गाँव मिले | केश्वदास के वंशज पिता भोज के नाम पर भोजपोता कहलाये | इनके पुत्र हरीजी के वंशज हरीजी का हाड़ा व् जगन्नाथ के वंशज पोता हाड़ा हुए |

24.इंद्राशालेत:- राव रतनसिंह के पोत्र और गोपीनाथ के पुत्र अन्द्रशल के वंशज | इन्होने इंद्रगढ़ नाम का नगर बसाया | यह बूंदी राज्य का मुख्या ठिकाना था | इसके अतिरिक्त दूगारी ,जूनीया ,चातोली ,आदी इंद्रशालोत के ठिकाने थे |
25.बैरिशालोत :- कुवर गोपीनाथ के पुत्र बैरिशाल वंशज | करवड़ ,बलवन,पीपलोदा ,फिलोदी आदी इनके ठिकाने थे |
26.मोहमसिहोत :- कुंवर गोपीनाथ के पुत्र मोहकमसिंह  के वंशज | सामुगढ़ (वि,१७१५ ) युद्ध में वीरगति प्राप्त हुए |
27.माहेसिहोत :-  कुंवर गोपीनाथ के पुत्र मोहेसिंह के वंशज | जजावर जैतगढ़ आदी इनके ठिकाने थे |
28.दीपसिहोत :- गोपीनाथ के बाद क्रमशः छत्रसाल ,भाम्सिंह व् अनिरुद्ध हुए | अनिरुद्ध के बुद्धसिंह व् जोथसिंह के उम्मेदसिंह व् दीपसिंह हुए | इन्ही दीपसिंह के वंशज दीपसिहोत हे वरुधा इनका मुख्या ठिकाना था
29.बहादुरसिहोत :- उम्मेदसिंह के पुत्र बहादुरसिंह के वंशज |
30.सरदारसिहोत :- उम्मेदसिंह के पुत्र सरदारसिंह के वंशज |
31.माधानी :- बूंदी के राव रतनसिंह के पुत्र माधोसिंह कोटा राज्य के शासक थे | इनके वंशज |इनकी निम्न उप खापे है |
१.मोहनसिहोत माधानी :- माधोसिंह के पुत्र मोहनसिंह के ने धरमत युद्ध ( वि.१७१५ ) में शाहजहाँ के पक्ष में वीरगति पायी |पलायथा इनका मुख्या ठिकाना था |
२,जूझारसिहोत :- madhosingh (कोटा ) के पुत्र जुझारसिंह ने भी धरमत के ययुद्ध में वीरगति पाई | इनको पहले कोटा राज्य का ठिकाना कोटड़ा मिला बाद में रामगढ़ \
३.प्रेमसिहोत :- माधोसिंह के पुत्र कन्हीराम ने आपने भाइयों के साथ हि धरमत युद्ध में शाहजहाँ के पक्ष में लड़कर वीरगति पाई | इनके पुत्र प्रेमसिंह के वंशज इनको कोयला का ठिकाना मिला |
४.किशोरसिहोत :- माधोसिंह के पुत्र किशोरसिंह के वंशज इन्होने भी धरमत के युद्ध में राजपूती शोर्य का परिचय दीया | वे युद्ध में लड़ते हुए घायल होकर बेहोस हो गए पर बच गए इनको बाद में सांगादे का ठिकाना मिला | बाद में कोटा की गादी पर बेठे | ओरंगजेब के शासन काल में कई युद्धों में भाग लिया | विक्रमी संवत १७५३ में ओरंगजेब के पक्ष में मराठों के विरुद्ध लड़ते हुए काम आया |

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