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Sunday, 14 July 2013

५.चंदवाड़ -राज्य चौहान राजवंश उतरपरदेश

५.चन्दवाड़ -राज्य :- उत्तर प्रदेश में आगरा के पास चन्दवाड़ है | वि .सं.१२५१ ई.११९४ में जयचंद्र गहड़वाल मोहम्मद गोरी से इसी स्थान पर पराजित हुए थे | चन्दवाड़ से सम्बंधित कवि श्रीधवर का वि.१२३० का लिखा हुआ ग्रन्थ भगविसयत कहा है | परन्तु इसमें चन्दवाड़ पर शासन करने वाले किसी राज्य का नाम नहीं है | कवि लक्षमण ने वि.सं.१३१३ में अण बयरयणपईव की रचना यही की थी | लक्ष्मण ने चौहान राजा भरतपाल के लिए यह लिखा की भरतपाल लक्ष्मण के समय के शासक आह्वमल्ल चौहान से तीन पीढ़ी पूर्व था | (भरतपाल -जाहड़-बल्लाल-आह्वमल्ल) इससे जाना जा सकता है की प्रति पीढ़ी २० वर्ष शासक काल के हिसाब से 60 वर्ष पीछे ले जाने पर १३१३-60 =१२५३ वि.होता है | इस समय (१२५३विक्रमी ) में भरतपाल यहाँ शासन कर रहा था | संभव है इससे पूर्व भी यहाँ चौहानों का राज्य रहा होगा | अब यह देखना है की चन्दवाड़ के चौहानों का सम्बन्ध कहा से था | संभवतः चौहानों की किसी साखा ने जिसका अजमेर से सायद कुछ सम्बन्ध रहा हो चन्दवाड़ में पैर जमाये | परन्तु प्रथ्विराज के पुत्र -पोत्रों या निकट के भाई बंधुओं में कोई यहाँ आये हो ,इसका कोई संकेत नहीं मिलता है | अतः अजमेर के चौहानों में से कोई इधर आया हो संभव नहीं लगता है | चन्दवाड़ कब बसा ? यह नगर संवत १०५२ में किसी चंद्रपाल नाम के राजा की स्मृति में बसा था | परम्परा में भी सत्य का अंश छिपा होता है | इधर राजस्थान में बीकानेर इलाके के कुचोर ,घाघु ,ददरेवा आदी पर शासन करने वाले चौहानों से सम्बंधित ऐतिहासिक काव्य क्याम खां रासा (१६१९ वि.) में उन्ही चौहानों का वंशज न्यामतखां (इनका पूरवज करमचंद ददरेवा फिरोज तुगलक के समय वि.१४४० के लगभग मुसलमान बन गया था ) लिखता है ''चंदवार चंदे करी इन्द करो इन्दोर | कान्हड़देव सुजान कहि ,रह्यो पिता की ठोर || 104 || रासा
घांघू (चुरू ) के बसाने वाले घंघराज चौहान के तीन पुत्र कान्हड़देव ,चंद और इन्द थे | उपयुक्त छंद में चंदद्वारा चंदवार (चन्दवाड़) बसाने की बात लिखी है | चन्द का समय विक्रमी की 11वीं शती पड़ता है | क्यूंकि चंद के भाई कान्हड़ देव के बाद क्रमशः अमरा,जेवर व गूगा (प्रसिद्द लोक देवता हुए )| यह गूगा मोहम्मद गजनवी के समकालीन थे | इनका समय लगभग वि.सं.१०८२ ई.१०२५ था | इस द्रष्टि से तीन पीढ़ी पूर्व के चंद का समय वि.सं.१०२२ वि.में किसी चन्द्रपाल नामक राजा द्वारा बसाया जाना माना जाता है | ऐसी स्थति में यह संभावना अधिक प्रबल जान पड़ती है की घांघू बसाने वाले घंघराज चौहान के पुत्र चंद किसी कारण आगरा के पास पहुँच गए और चंद के बैटे -पोतों ने अपने पूरवज के नाम से चंद के नाम से चंदवाड़ बसाया हो और इस प्रकार
चंदवाड़ राज्य की स्थापना करने वाले चंद चौहान के वंशज होने चाहिए और इसी चन्द चौहान का वंशज भरतु (भरतपाल ) होना चाहिए |
भरतपाल के समय जैसा लिखा हे की वि.१२५३ के लगभग होना चाहिए | इसके बाद १३१३ वि.में लक्ष्मण द्वारा अनुव्रत रत्न्प्रदिप के अनुसार क्रमशः जाहड़,बल्लाल और आह्वमल्ल हुए | आह्वमल्ल व् लक्ष्मण के समय १३१३ वि.में मौजूद था | लक्ष्मण ने आह्वमल्ल द्वारा मुसलमानों के विरुद्ध संघर्ष करने का अतिशयोक्ति पूरण वर्णन किया है | इससे जाना जा सकता हैं की चौहान अब तक भी मुसलमानों से बराबर टक्कर ले रहे थे | इसके बाद यहाँ के चौहानों का इतिहास वि.सं,१४५४ में रचित बाहुबली चरिउ -प्रश्स्ति में मिलता है | इसमें यशवंत चौहान का नाम सबसे पहले आता है | यशवंत का आहवमल्ल चौहान से क्या सम्बन्ध था पता नहीं चलता लगता है | पर यह चंदवार का चौहान हि था चाहे आवहमल्ल का वंशज हो चाहे उसके किसी भाई का वंशज हो | उसमें क्रमशः यशवंत चौहान के बाद गणपति ,कर्णदेव ,सारंग और अभयचंद हुए | अभयचंद के दो पुत्र जयचंद वा रामचंद हुए | इस राजाओं के समय जायसकुलिन यशोधर के वंशज मंत्रिपद पर थे | यशवंत के मंत्री यशोधर ,गणपति के गोकरण व् कर्णदेव के मंत्री सोमदेव थे |
रामचंद चौहान के समय १४८६ वि.शुक्रवार ज्येष्ठ कृष्णा 15 के दिन अमर कीर्ति द्वारा रचित छ्क्म्मोवएस की प्रतिलिपि हुयी | संवत १५०६ में पंडित कवि रइधु ने शांतिनाथ के बिम्ब की प्रतिष्ठा करायी ,उस समय रामचंददेव युवराज प्रतापचन्ददेव का राज्य था | मुहम्मदशाह तुगलक के विरूद्ध सं.१४४८ ई.सुमेरशह सधारण ,जीतसिंह राठोड़ आदी ने दोआब के अन्य राजपूतों को संगठित कर विद्रोह कर लिया था |मुहम्मद तुगलक ने मालिक मुकबर्खन को विद्रोह दबाने भेजा ,युद्ध हुआ पर मुक्बर्खन जीत नहीं सका तो संधि के लिए कन्नोज के किले बुलवाया | सुमेर (संभतः मैनपुरी ,प्रतापनगर ,राजोर आदी के चौहान इसी सुमेर के वंशज है या चंदवाड़ क्षेत्र के अचौहन इन्ही चौहानों के वंशज है |) के किले में अतिरिक्त सभी विद्रोह राजपूत छल से कन्नोज के किले में मरे गए | इस प्रकार अभयचंद को मार दिये जाने पर बासाहर में अभयचंद के पुत्र जयचंद को गद्धी पर बिठाया गया | इन्होने खीजखां सैयद की अधीनता स्वीकार की | वि.१४७२ में खिजह खां ने ग्वालियर से होकर कटेहर पर आक्रमण किया | उस समय चंदवाड़ का शासक जयचंद का छोटा भाई रामचंद था | इसके बाद उसका पुत्र प्रताप्चंद संभवतः चंदवाड़ का शासक हुआ | वि.१५३७ ई.१४८० के कुछ पूर्व चौहानों का वहां से राज्य समाप्त हो गया | उतरप्रदेश के चौहानों में प्रायः चौहान चंदवाड़ के चौहानों के वंशज मालूम देते है | राजस्थान में राणा सांगा के समय माणिकचंद ,चंदभाण आदी मैनपुरी की और से मेवाड़ में आये | यहाँ राजस्थान में पूरबिया चौहान कहलाये | इन पूरबिया चौहानों के लिए कहा गया है की प्रथ्विराज के बाद चौहानों के पतन काल में अजमेर से कई चौहान मैनपुरी up की तरह चले गए | उन्ही के वंशज मैनपुरी की और से राजस्थान में आये | ये पूरबिया चौहान कहलाये परन्तु ये पूरबिया चौहान चन्दवाड के चौहान होने चाहिए क्यूँ की मैनपुरी आदी इन पर इन्ही का शासन था और चंदवाड़ पर शासन करने वाले चौहान अजमेर के नहीं ,घांघू ,ददेरवा ,बीकानेर (राजस्थान ) के चौहान चंद के वंशज होने चाहिए |

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