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Tuesday, 10 September 2013

परमार राजवंश २. बागड़ (मेवाड़ ) का राज्य डूंगरपुर और बांसवाड़ा

बागड़ मेवाड़ :- मेवाड़ का डूंगरपुर व् बाँसवाड़ा का क्षेत्र बागड़ कहलाता है | इस क्षेत्र पर डबरसिंह परमार ने विकर्मी की १०वीं सदी के उतरार्ध में राज्य स्थापित किया | बागड़ पर अधिकार करने वाला डबरसिंह कोन था ? ओझाजी के अपने ग्रन्थ राजपुताना के इतिहास में तीन स्थानों में अलग -अलग बाते लिखी है | ऐक स्थान पर इन्होने लिखा है की क्रष्णराज के बैरीसिंह व् डबरसिंह थे | जिनमे बैरीसिंह उसका उतराधिकारी हुआ और डबरसिंह को बागड़ का इलाका जागीर में मिला | दुसरे स्थल में लिखते हे '' मालवे के परमार राजा वाक्पतिराज के दुसरे पुत्र डंबरसिंह के वंशज में बांगड़ के परमार है | तीसरे स्थल पर कृष्णाराज (उपेन्द्र ) का वंशवृक्ष देते हुए कृष्णराज का पुत्र बैरीसिंह के दो पुत्र सीयक और डंबरसिंह लिखा है | परन्तु वि.सं. १२३६ फाल्गुण सुदी ७ शुक्रवार के अरथुणा के परमार शासक चामंड के शिलालेख से पाया जाता है की डंबरसिंह बैरीसिंह का छोटा भाई था |
त्स्यान्वे क्रमबंशादुदपादिवीर: श्री बैरीसिंह इति सम्भ्रतसिंह नाद : ||........|| तस्यानुज जो उम्ब रसिंह ( अर्थूणा शिलालेख ) अर्थात वाक्पति परमार का पुत्र था | वाक्पति ने अपने छोटे पुत्र डंबरसिंह को बागड़ की जागीरी दी |
डंबरसिंह का उतराधिकारी धनिक था | उसने उज्जेन में धनीकेश्वर शिवमंदिर बनवाया | इसके बाद इसका भतीजा चच बागड़ का स्वामी हुआ | चच के बाद कंकदेव बागड़ का शासक हुआ | कंकदेव का चच से क्या सम्बन्ध था ? मालूम नहीं होता | ओझाजी ने कंकदेव को चच का पुत्र होने की संभावना की है | कंकदेव सीयक सेकेंड (हर्ष ) के पक्ष में कर्नाटक के शासक खोट्टीग्देव राष्ट्रकूट की सेना का संहार करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ | कंक्देव के बाद क्रमशः चंडप ,सत्यराज ,लिबराज, मंडलीक (छोटा भाई ) व् चामुंडाराज गद्धी बेठे | इसने वि.सं. ११३६ ई.१०७९ में अर्थूणा (बाँसवाड़ा) में मंडलेश्वर का शिव मंदिर बनवाया | इसके समय का अंतिम शिलालेख वि.सं. ११५९ ई.११०२ का है | इसका पुत्र विजय सिंह हुआ | इसका समय लगभग वि.सं. ११६५ -११९० तक था | मेवाड़ के गुहिल शासक सामंत सिंह से मेवाड़ का राज्य छूटने पर उसने विजय सिंह के वंशजों से वि. १२३६ के लगभग बागड़ का राज्य छीन लिया था  | बागड़ के परमारों के वंशज आजादी से पूर्व सोंथ (महीकांठा -गुजरात ) के राज थे |

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