अनादिकाल काल से चले आ रहे सनातन धर्म की जय हो

Thursday, 15 September 2016

भारत के प्रतापी सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार

भारत के प्रतापी सम्राट क्षत्रिय मिहिरभोज प्रतिहार की जयंती 18/अक्टूबर को संपूर्ण भारत वर्ष में आयोज्य।।

मिहिरभोज प्रतिहार क्षत्रिय शासक वृहत भारत के एक प्रसिद्ध प्रतापी एवं वैभवशाली शासक थे। उक्त प्रतिहार क्षत्रिय वंश के शासन बाद के अन्य दूसरे क्षत्रिय शासकों की चुनौती बाद के, छोटे छोटे विभाजनों फलस्वरूप प्रतिहार (परिहार) राजवंश, अलग-अलग स्थानों पर शासित अथवा विभाजित हो गए।

यह क्षत्रिय राजवंश, उस काल के श्रेष्ठ शक्तिशाली ऐश्वर्यशाली राजवंशों में गिना जाता था। बाद में प्रतिहार वंश परिहार, इंदा, देवल , कलहंस, मडाढ , खडाड  इत्यादि के रुप में अपने अपने मूल पुरुषों के नेतृत्व में पश्चिम दक्षिणी राजपूताना गुजरात (सौराष्ट्र) एवं उत्तर, मध्य पूर्व भारत के विभिन्न भागों में छोटी बड़ी रियासतों के रुप में राज्य भोग करता रहा।

राठौड़, सिसोदिया (गहलोत) कच्छवाहा वंश के राजपूताना, राजस्थान में आगमन एवं वर्चस्व से पूर्व संपूर्ण भारतवर्ष पर प्रतिहारों, सोलंकियों, चावड़ा इत्यादि विभिन्न वंशों का शक्तिशाली एवं  वैभवशाली राज था। राठौड़ों के कन्नौज से मारवाड़ (जोधपुर) की ओर आगमन के समय, मारवाड़ के मंडोर (मंडोवर) नामक स्थान पर प्रतिहार (परिहार) वंश का राज था|

उक्त मंडोर नामक अति प्राचीन स्थल मारवाड़,जोधपुर के केन्द्रीय स्थल पर पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है। इसे मंडोवर के रुप में भी जाना जाता है, जो अपभ्रंश में पूर्व के मंडोवरी बाद बोलचाल में मंडोवर बोला अथवा कहा जाता था, जो वर्तमान में मंडोर हो गया। इसके बारे में प्राचीन समय से जनश्रुति चली आ रही है, कि, यह रामायण काल के समय के राक्षसी प्रवत्ति के राजा रावण की धर्मपरायण पत्नी मंदोदरी का पीहर था।

उक्त जनश्रुति ऐतिहासिक रुप से प्रमाणित नहीं,
पर उक्त स्थान के पुरातात्विक महत्व की कहानी, इस स्थल की प्राचीनता बयान करती है।
इस स्थल के उक्त पुरातात्विक महत्व को मानकर ही, तो भारत सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा यहाँ इस स्थल की, पुरातात्विक महत्व की मुर्तियों, छत्रियों, पहाड़ियों को अपनें कब्जे नियंत्रण में रखते हुए, इन सभी की देखरेख की जा रही है, पुरातत्व खोज बीन जारी रखते हुए विभाग के विभिन्न नये पुराने शोधार्थियों द्वारा रिसर्च जारी है, तथा विभाग नें यहीं अपना एक क्षेत्रिय कार्यालय भी स्थापित कर रखा है|

जो मध्य पूर्व के मुस्लिम आक्रांताओं के दिल्ली सल्तनत पर काबिज होने बाद के, यहाँ मंडोर राज्य पर आक्रमणों एवं विभिन्न सैन्य पड़ावों के बाद कमजोर सा पड़ने लगा। राव चूंडा जी, जो कन्नौज के राठौड़ वंश से अपनें पूर्व पीढ़ी से यहाँ मारवाड़ के विभिन्न भागों पर काबिज शासन के शक्तिशाली उत्तराधिकारी थे, उनके साथ प्रतिहार (परिहारों) नें वैवाहिक संबंध स्थापित करते हुए, अपनी पुत्री के साथ अपना राज्य मंडोर दहेज रुप में सौंप दिया।

तो बाद में राव जोधा जी राठौड़ नें मारवाड़ राज्य का विस्तार करते हुए, विशाल मेहरानगढ़ किला निर्मित करते हुए, जोधपुर रियासत का मुख्य स्थान बना मंडोर (मंडोवर) को अपनें राज्य की राजधानी रुप में स्थापित किया। मेहरानगढ़ दुर्ग मारवाड़ के राठौड़ शासन का मुख्य केन्द्र था जो वर्तमान में जोधपुर शहर के मुख्य केन्द्र में स्थित है, मंडोर उसके पास ही मेहरानगढ़ दुर्ग पहाड़ी की तलहटी में ही स्थित है।

राव चूंडा जी नें विवाह बाद परिहारों से मंडोर राज्य ग्रहण करते हुए, तो राव जोधा जी राठौड़ नें प्रतिहार वंश की कुलदेवी चामुण्डा माता को भी अपनें राठौड़ वंश की ईष्ट देवी रुप ग्रहण करते हुए, मंडोर से इन्हें अपनें नव स्थापित मेहरानगढ़ के किले में स्थापित करवाया।  जो वर्तमान में भी मेहरानगढ, जोधपुर दुर्ग के प्रसिद्ध मंदिर में विराजित हैं। चामुंडा माता को राठौड़ों द्वारा अपनें ईष्ट देवी रुप में ग्रहण के बाद, श्री गाजण माता को प्रतिहारों अपनें कुल देवी के रुप में ग्रहण किया। जो वर्तमान जोधपुर जिले के शेरगढ़ परगनें (शेरगढ़ विधानसभा क्षेत्र) में मंडोर के परिहार वंश की ही मुख्य शाखा रुप में इंदा वंश की इंदावटी (चौबीस गांवों के मुख्य केन्द्र) बेलवा नामक स्थान पर विराजमान है।

उक्त बेलवा गांव इंदाओं के मुखिया राणा जी के रुप में मान्य है। जो बेलवा गांव से आज भी उक्त चौबीस गांवों के मुख्य प्रतिनिधि (मुखिया) के रुप में मान्य है। एवं राणा जी के पदनाम की पारंपरिक उपाधि से सम्मानित है। इतिहासविद मित्र बंधुओं से निवेदन है, कि उक्त इंदावटी (चौबीस गांवों के परगने) के मुख्य पाटवी स्थान, बेलवा गांव को मंडोर के पूर्व शासक परिहार वंश की इंदा शाखा के मुख्य केन्द्र स्थान में रखते हुए चामुंडा माता के राठौड़ वंश द्वारा ग्रहण के बाद में गाजण माता को इस वंश की कुलदेवी रुप में मान्य एवं प्रतिष्ठित किया गया, तथा राणा जी इस इंदा शाखा के मुखिया रुप में पारंपरिक रुप से पद स्थापित एवं सम्मानित है। तथा वे उक्त मंदिर के व्यवस्थापक एवं सरंक्षक है।

जय मां गाजणा।।
जय मिहिरभोज।।

No comments:

Post a Comment