अनादिकाल काल से चले आ रहे सनातन धर्म की जय हो

Monday, 21 November 2016

राष्ट्रवीर,स्वाभिमान,जोधपुर राज्य के रक्षक वीर दुर्गादास जी क्षिप्रा के तीर पूज्य तन सिंह जी की रचना

पूज्य श्री तन सिंह जी की रचना जब भी इनकी लिखित रचनाएं पढते तो हे रोम रोम काँप उठता है मानो पूज्य श्री तन सिंह जी अतीत का लाइव प्रसारण कर रहे है उनमें से 1 रचना यह भी हे क्षिप्रा के तीर वीर दुर्गादास जी राठौड़ पर जिन्होंने ताउम्र जोधपुर राज्य की रक्षा की और अंत में उन्हें जोधपुर छोड़ना पड़ा लास्ट के कुछ दिन क्षिप्रा नदी पर बिताए वहीं उन्होंने अंतिम सांस ली वहा क्षिप्रा नदी के तट पर बना स्मारक कुछ कह रहा है लेकिन अफ़सोस सुनने वाला कोई नही

क्षिप्रा के तीर से

चलूँ ! मालवा धरा निमंत्रण दे रही है | दो अँगुलियों से घूंघूट उठाकर देख रही है , मुझे आते हुए | उसके हरे भरे आँचल में आग की धड़कने सिमटी हुई है | ज्यों -ज्यों उज्जैन नगर समीप आ रहा है , त्यों त्यों रेलगाड़ी हांफती हुई जैसे पहुँचने के आतुर हो रही है और मैं बैचेन हूँ , यह ढूंढ़ने के लिए , कि इस नगरी में हृदय की वह कौनसी आग है - वह किसकी स्मृति है , जो दबे पांव शमशान घाटों पर मेरी प्रतीक्षा किया करती है |

भूतकाल की यह अविन्तिका नगरी वर्तमान की उज्जयनी है | यहाँ एक ओर मुझे राजा भर्तहरी नीति, श्रंगार और वैराग्य का समन्वय करते हुए आकृष्ट कर रहे है , वहां दूसरी ओर विक्रमादित्य और भोज निमंत्रण दे रहे है | यहीं कालिदास का मेघदूत मुझे कोई नवीन सन्देश देने को आतुर है , किन्तु इससे से परे मेरा खून मुझे बुला रहा है |

एक टीस , एक धड़कन जो युगों से मेरे हृदय को स्पंदित कर रही है ;जैसे कह रही है - ' दुनियां ढूंढ़ रहे हो, तो यहाँ आकर भी देखो , मेरे हृदय में भी शोले है , जिन पर राख चढ़ती जा रही है |' इतिहास का एक पन्ना फडफड़ा कर फट रहा है और मैं हृदय की गहरी गलियों में भटकता खो सा रहा हूँ - कौन है वह , जो मुझे अपना समझकर मिलना चाहता है ? तो चलूँ कोने कोने और कण-कण को ढूँढू - शायद कोई बिछुड़ी हुई वेदना मिलन के लिए कराह रही हो |

शायद किसी महान हृदय का अंतिम अरमान धूल-धूसरित होकर अंतिम तोड़ रहा हो ; शायद कोई यादगार -कोई सुनहली यादगार अपनी आयु के लिए दामन पसारकर संसार से भीख मांग रही हो ; शायद किसी युग पुरुष के जीवन की अंतिम विदाई संसार के नाम कोई दर्दभरी पाती लिखकर किसी संदेशवाहक की प्रतीक्षा कर रही हो और मेरे कदम चल पड़े |

हाँ !
यही रेलवे स्टेशन है | सीधे चले जाइए |
यह चक्रतीर्थ का श्मशान घाट है | यहाँ चिताएं चल रही है | कहीं भाग्य की आग में दुर्भाग्य जल रहा है , तो कहीं दुर्भाग्य की आग में भाग्य | कई जल कर बुझ गयी है और कई बुझकर काल की आंधी के साथ राख बनकर उड़ गयी है | यहाँ कई ललनाओं का सिंदूर अंगारों में जलकर कजला गया है | कई बनती और बिगडती राज्य लक्ष्मियों की गाथाएँ इतिहास निर्माताओं की चिता पर सती हो गयी | यहाँ नन्ही नन्ही कलियों की किलकारियां संसार की अनित्यता से झूझती हुई विश्राम कर रही है |

यही कहीं विक्रमादित्य और भोज जैसे लोकप्रिय और निष्पक्ष शासकों की पवित्र स्मर्तियाँ काल के कदमो से कुचली जा रही होगी | समीप ही कालिदास की लेखनी किसी नई कल्पना की प्रतीक्षा में थककर सो रही होगी | मृत्यु और शांति का यहाँ शाश्वत गठबंधन है , पर नीरवता के इस एक छत्र साम्राज्य में वह कौन है , जो मुझे बुला रहा है - घोड़े पर चढ़ा हुआ , हाथ में भाला लिए | तो सुनें , उसके पास जाकर , वह क्या कहना चाहता है ?

जो मुझे बुला रहा है - घोड़े पर चढ़ा हुआ , हाथ में भाला लिए | तो सुनें , उसके पास जाकर , वह क्या कहना चाहता है ?

वि.स. 1695 की श्रावण शुक्ला चतुर्दशी को मुझे एक माता मिली और मैंने उस जननी को कभी लज्जित नहीं होने दिया | ममता के क्षण आये , स्मृतियों के सुनहले और रुपहले अवसर आये , पर मुझे उसकी नहीं , उसके दूध की याद आती थी | वह मुझे बहुत प्रिय थी , पुन्य लोकों से भी प्रिय , परन्तु उससे और सबसे प्रिय थी मुझे उसकी लाज | इसलिए मैंने सभी सुखों को ठोकर मारकर , अनेक कठिनाईयों को सहकर , माँ के दूध की लाज रखी |

दुनियां मेरे विषय में बहुत कुछ जानती है , पर यह नहीं जानती , कि मैंने भी विवाह किया था | स्नेह के मांगलिक और मादक अवसरों को सहज में ही कौन ठुकराता है ? किन्तु कर्तव्य पालन के क्षणों में मैंने घूमकर भी उसकी तरफ नहीं देखा | वह मुझे उलाहने दे सकती है, मुझे निर्मोही भी कह सकती है , लेकिन यह नहीं कह सकती , कि मैंने उसके चूड़े की लाज नहीं रखी |

ठाकुर रूप सिंह की हवेली का वह दिन मुझे अच्छी तरह याद है , जब दिल्ली में जोधा महेशदास जी ने मेरे मालिक की प्राणप्रियाओं को तलवार के घाट उतार दिया था | आग में जलने का वक्त ही कहाँ था और इसीलिए खून का घूंट पीकर मैंने बहते हुए खून को देखा | मेरा खून अपने कर्तव्य की याद दिला रहा था और मैंने उस दिन देखा , कि कर्तव्य - पालन के मार्ग पर अपने विश्वासों के लिए मरने की अपेक्षा , जीना अधिक कठिन है | पर मैंने कठिन होते हुए भी अपने कर्तव्य की लाज रखी |

उस दिन मुगलों ने हमें घेर रखा था | उनकी संख्या बहुत थी पर हम तो इने गिने ही थे | लेकिन उस दिन कर्तव्य का मुझे आदेश था , कि मैं मरुँ नहीं, घुल-घुलकर मरने के लिए जिन्दा रहूँ |मैंने आदेश का अक्षरश: पालन किया | कड़े घेरे को तोड़ दिया , थक भी गया था , खून से लथपथ भी हो गया था , पर जिन्दा रहा | मैंने जिन्दगी और मौत दोनों की लाज रखी |

मेरे भी बच्चे थे | निर्दोष कलरव से मेरा आँगन भी कभी मुस्कराता था | दुनियां के बच्चों को देखकर मुझे कई बार अपने घर की फुलवारी में फूले हुए उन निष्पाप पुष्पों कि याद आती थी | सुरमई घटाओं को देखकर , मुझे मालूम नहीं , शायद उन पुष्पों की आँखों में भी कभी मेरी याद के आंसू आते होंगे , परन्तु प्यार से मैंने न कभी उनको पुचकारा न कभी उनके आंसू पौंछे | औरंगजेब के भी बच्चे मुझे - " बाबा-बाबा " कहकर पुकारते थे , परन्तु मेरे बच्चे मुझे क्या पुकारते होंगे , मुझे पता ही नहीं | संतान से दूर रहकर भी मैंने आने वाली संतान के गौरव की लाज रखी |

एक दिन मुझे महाराजा जसवंत सिंह जी ने पूछा , कि मैंने उनके राईके ( ऊँटों की देखभाल करने वाला ) को कैसे काटा , और मैंने पास ही खड़े राईके का झट से सिर काटकर उदहारण दिया | पर दंड के बदले मुझे उनकी सेवा का पुरस्कार दिया गया और मैंने उनके अन्न की लाज रखी |

जमरूद के थाने पर शिकार करते हुए एक दिन हम पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे | मुझे नींद आ गयी | धूप आने लगी तो स्वयम महाराजा ने मुझ पर छाया की | उमराओं ने कहा - इस अदने आदमी के लिए आपने कष्ट क्यों किया ? तब उन्होंने उत्तर दिया था - ' उमरावो ! यह लघुता नहीं , गौरव है , क्योंकि आज मैं इस पर छाया कर रहा हूँ , एक दिन यह , मेरे कुल और सारी मारवाड़ पर छाया करेगा |' मैंने सारा जीवन खपा कर उनके वचनों की लाज रखी |

खिंची मुकंद दास मेरे जीवन -दीपक में तेल भरता रहा और मैं जिन्दगी भर जलता रहा | जलता रहा और जल-जल कर जलने की कहानी को जीवन का नाम देता रहा | जब जलने का अमर इतिहास निर्मित हो रहा था , तब मैं बुझ भी कैसे सकता था | बड़ी कठिनाईयों और कष्टों के बीच मैंने अजीत सिंह का रक्षण , पालन और पोषण किया | स्वामी के नमक की पाई -पाई की मैंने लाज रखी |

मारवाड़ का राज्य देने की मुझ पर लालच की फांसी फैंकी गई और मैंने उसे छलना और फिसलन समझकर राजपूत चरित्र की लाज रखी | राज्य के मोह से छाला जाता तो निश्चय ही तुम मेरे नाम पर थूकते | मैंने एक अत्यंत साधारण और सामान्य राजपूत घराने में जन्म लिया तो क्या हुआ , मैंने राजपूती की लाज रखी |

औरंगजेब के सामने एक दिन मेरा और शिवाजी महाराज का चित्र रखा गया , तो उसने शिवाजी के लिए कहा था - इस पहाड़ी चूहे को तो मैं पकड़ सकता हूँ , पर मेरे लिए कहा - 'किन्तु इस मारवाड़ी कुत्ते ने मेरी नाक में दम कर रखा है |' मैंने वास्तव में एक कुत्ते की तरह ही स्वामी भक्ति की लाज रखी |

अजीत सिंह के लिए एक दिन यवन सम्राट ने मेरा पीछा किया | अनेक कठिनाइयों को सहते हुए जब वह जालौर के पास पहुंचा , तब उसे मालूम हुआ कि मैं तो बहुत पहले अरावली की पहाड़ियों से ही उससे अलग होकर मालवा की तरफ आ गया | क्रोध में आकर उस समय उस धर्मान्द सम्राट ने अपनी पवित्र और श्रद्धेय कुरान को फेंक दिया | मेरी वह शानदार विजय थी | मैंने राजपूतों की राजनीतिज्ञता की लाज रखी |

मैंने मारवाड़ और मेवाड़ को ही एक सूत्र में नहीं बाँधा , मैं तो मरहटों से भी मिलने के लिए दक्षिण में गया था | मैं धरती का पुत्र था और मैंने इस धरती के सुहाग और स्वतंत्रता की लाज रखी |
कष्टों को मैंने घोड़े की पीठ पर ही चढ़कर सहन किया | तुम्हे आश्चर्य होगा , पर यह सत्य है , कि मैंने रोटियों को अपने भाले की अणि (नोक ) से सका और उन्हें घोड़े की पीठ पर ही बैठ कर खाया | ध्येय साधना के निमित किये गए तपस्वियों के तप की भी मैंने लाज रखी |

शत्रु की संतान मेरे हाथ लगी और उसे अपनी संतान की तरह पाला और पोषा | आश्रय में आये विपत्तिग्रस्त दुखियों पर मेरा हाथ कभी नहीं उठा | उस यवन सुन्दरी को तो मैंने कभी आँख से भी नहीं देखा | मैं एक आर्य था और मैंने आर्य चरित्र की भव्यता की लाज रखी |

तुम समझ रहे हो , मैं आत्मश्लाघा में बहता जा रहा हूँ | नाम कमाने की मेरी इच्छा कभी नहीं हुई | मैं तो हनुमान था | तेल और सिंदूर पर ही संतुष्ट रहा | मैं आत्मश्लाघा नहीं कर रहा हूँ , अपनी व्यथा कह रहा हूँ तुमसे | तथ्य कह रहा हूँ - केवल तथ्य , क्योंकि जीवन में सदैव सत्य की ही मैंने लाज रखी है |

इतना होते हुए भी मुझे देश निकला दिया गया | मेरी अटूट निष्ठां और सतत सेवा के बदले मुझे काले वस्त्र ,काला घोडा और काली ढाल मिली | मैंने इस उपहार को भी ख़ुशी से स्वीकार किया और मैं चल पड़ा उस माँ मरुधरा से , जिसके लिए मैं तीस वर्षों तक पहाड़ों की खोहों में , नदियों ,घाटियों और बालू रेत के टीलों में भटकता रहा | जिसके लिए मैंने घोड़े पर ही दिन गुजारे ,घोड़े पर ही रातें गुजारी , घोड़े पर बैठे ही खाना पकाया और घोड़े की पीठ पर ही बैठ कर खाया | लेकिन रवाना हुआ तब कोई नहीं कह सकता , कि अपने बुढ़ापे के सहारे के लिए एक लकड़ी भी वहां से उठाई हो | कोई नहीं कह सकता कि विदा के समय निराश होकर मैंने देशवासियों को गाढे राम-राम कहें हो |

कोई नहीं कह सकता कि मातृभूमि के प्रेम के कारण उस समय मेरी आँखों में विवशता का एक आंसू भी टपका हो | मैं तो ऐसे चल पड़ा जैसे कोई बंजारा अपनी बालद लेकर चल पड़ा हो | ऐसे चला गया , जैसे किसी दूर देश का पंछी रात का बसेरा छोड़कर फिर अपने वतन के लिए उड़ जाता हो | न किसी को दोष दिया , न किसी को भला बुरा कहा | मैंने समाज चरित्र की भी लाज रखी |

मैं चलता गया चलता गया | न किसी ने मेरा कुशल पूछा , न किसी ने मेरी व्यथा सुनी ; मालवा की भूमि छोड़ी ; किसी ने मुझे यह नहीं कहा ,कि मुसाफिर ! तुम थक गए हो , थोडा रुक कर विश्राम भी कर लो | पर इस स्थान पर क्षिप्रा की लहरों ने मुझे रोका | मेरी मनुहार की , अपना आँचल पसारा और मेरे पैर रुक गए | इन लहरों ने मुझे नहलाया , मुझे पवित्र किया और कभी जाने नहीं दिया | इस पावन सरिता ने मुझे कहा था , " दुर्गादास ! दुनियां की कृतध्नता का कभी ख्याल भी मत लाना !' और मैंने उदारता की लाज रखी |

तुम रो रहे हो |
मैंने आंसुओं को निर्बल समझा है | कर्तव्य पालन के उन दिनों में मेरी आंख से कभी आंसू नहीं निकला | भावना को सदैव मैंने कर्तव्य की दासी बनाकर रखा था , पर इस सजल क्षिप्रा के तीर मेरी आँख का संचित धन बह पड़ा , तब मैंने छुट्टी दी बहो ! आज और केवल आज, जी भर कर जितना बहना चाहो , बहो ! फिर कभी यह शिकायत मत करना कि दुर्गादास ने आंसू नहीं बहाया | आँखों ने मेरी और मैंने आँखों की लाज रखी |

इस नदी के किनारे मैं जिन्दगी भर तडफता रहा | अरमानो की आग में जलता रहा | उपेक्षा की निर्लज्जता में सड़ता रहा , परन्तु यह कोई नहीं कह सकता , कि मेरे मुंह से एक बार भी ' उफ़ ' निकला | वि.स.१७७५ की मार्गशीष शुक्ला एकादशी की अंतिम बेला में मेरा पार्थिव शरीर इस क्षिप्रा के तीर अपनी जननी और मातृभूमि से कोसों दूर जल गया | मेरी चिता मातृभूमि की गोद के लिए तरसती रह गयी | नौ कुंटी मारवाड़ में मुझे एक कूंट क्या , तीन हाथ जमीन भी अंतिम विश्राम के लिए नहीं मिली | मेरे जीवन में कितने साथी थे , पर अंत समय में मैं अकेला था और मेरी अर्थी उठाने वाले आठ हाथ भी मालवा के थे | अंतिम इच्छा एक बार मातृभूमि के दर्शन मात्र की थी , पर जिन्दगी में इतनी इच्छा जला डाली , तो इस इच्छा को भी चिता के साथ सदा के लिए जला डाला | परन्तु सामर्थ्यवान होकर भी मैंने किसी नियम और मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया | मैंने समस्त मर्यादाओं की मर्यादा की लाज रखी |

इस समाधि से मैं देखता रहा | समय ने इतिहास के पन्ने पलटने शुरू किये | मैंने देखा - भाई ने भाई को भुला दिया और वे आपस में लड़ने लगे | परिणामों के भय ने कर्तव्य को भुला दिया और वे कूटनीति की छलना में छले गए | शत्रु के टुकड़ों पर आँख गड़ा कर मेरे स्वाभिमान और गौरव को लज्जित किया गया | मेरे विजयी जीवन को शाश्वत हार में बदल दिया गया | फिर भी मेरी जय-जैकार की निर्लज्जता प्रदर्शित करने लगे |

यह सब देख मैं दुःख और पीड़ा से तिलमिला उठा , यधपि मैं जीवन भर कभी दुखी नहीं हुआ | मेरी आत्मा तडफती रही किन्तु उनके तो दिल पत्थर के हो गए थे | मैं धिक्कारता रहा , किन्तु उनके कान बहरे हो चुके थे | तब मैंने सोचा - मैं निपूता ही मरा था |
मेरी समाधि पर फूल चढ़ाये गए | मेरी गाथाएँ लिखी गई | मेरे वियोग में कविताएँ पढ़ी गई | मेरी जयन्तियां मनाई गई | मेरे लिए आंसू बहाए गए , लेकिन न उन फूलों में सौरभ था ; न उन गाथाओं में में आग थी ; न उन कविताओं में वेदना थी ; न उन जयन्तियों में कर्मठ श्रद्धा थी और न उन आंसुओं में असली पानी था | मैं हैरान हो गया | लोग मेरा अभिनय तो इतना करतेहै , पर सही अर्थों में मुझे कोई जानता ही नहीं |

उत्तेजित होकर मैंने इतिहास की किताब ही बंद कर दी | मैंने बादलों को सैकड़ों बार कहा - ' बादलो ! तुम मारवाड़ में तो बरसते ही नहीं हो ! वही जाते जाते तुम्हारे आंसू शायद सूख जाते है ? तो लो मेरी व्यथा को ले जावो | सागर सिमटे हुए है मेरी व्यथा में , और इसे ले जाकर मेरे देश वासियों के आँगन में बरसाओ | वह धरती मेरी व्यथा के लिए तरस रही है और मेरे आंसू उस धरती के लिए तरस रहे है | ' पर बादल मेरी क्या सुनते जब मेरे मालिक ने भी मेरी बात नहीं सुनी |

इसी क्षिप्रा के तीर मैंने सैकड़ों ग्रीष्म ऋतुएँ भी देखि है | पश्चिम दिशा से बहने वाली लुओं (गर्म हवाओ) से मैंने एक बार अनुरोध किया था , कि तुम तो मेरी मातृभूमि के ऊपर से आई हो , फिर अपने साथ उस देश की राज क्यों नहीं लाई , जिसको मस्तक पर लगाकर मैं धन्य होता ? पर वे भी बेचारी बेबस थी , क्योंकि उन्हें भी काल ने मारवाड़ से निष्कासित कर दिया था | वेदना और व्यथा से वह गर्म-गर्म निश्वास मेरे पास छोड़कर चली जाती है |

इस क्षिप्रा के तीर मैंने सैकड़ों शिशिर और हेमंत ऋतुओं से अनुरोध किया था - रहम करो, मेरे देश के बंधुओं पर ! उनके खून में बंधुत्व की गर्मी आने दो | देश प्रेम की आग धधकने दो, कर्तव्य के ज्वालामुखी फटने दो , कुछ कर गुजरने के शोले भड़कने दो ; पर वे किसी व्यापक षड्यंत्र के सक्रिय मोहरों की भांति मेरे अरमान को ठंडा करती गई | सोचता हूँ क्या करूँ ? कुछ कर भी नहीं सकता , कहाँ जाऊं ? विवशता से मैंने इसी स्थान पर शताब्दियाँ गुजार दी |

पर हाँ , तुम कैसे आये ? तुम तो मेरी मातृभूमि से आ रहे हो न ? तुम निश्चित ही मेरे देश से निर्वासित नहीं हो , क्योंकि न तुम्हारे वस्त्र काले हैं, न तुम्हारे पास काल घोडा या काली ढाल ही है | तब सुनो , मेरे बंधू ! वापिस लौटकर जाओ तो मेरा भी एक करना | जब मेरी मातृभूमि आये , तो पहला कदम उस पर रखने से पहले उस धरती को मस्तक से लगाना और कहना - ' दुर्गा ने तुझे प्रणाम कहा है और यह भी कहा है , कि कभी कभी आशीर्वाद तो किसी आते जाते के साथ भेज दिया करो |'

मेरे गाँव जावो और पुरानी और जीर्ण खेजडियों और बोरडियों को देखो , तो उन्हें भी कहना - ' तुम्हारा दुर्गा तुम्हारे समाचार सदा पूछता रहता है और खुद भी आ सकता है पर कर्तव्य उसे आने नहीं देता | वह अपना कर्तव्य पालन कर रहा है |' यदि तुन्हें मेरे मगरों के मोर दिख जाये तो उन्हें पूछना - ' तुम अपने दुर्गा को भूल तो नहीं गए हो ? ' और उन्हें मेरी और से अब के श्रवण मास में क्षिप्रा के तीर आने का निमंत्र्ण देना , कहना - उसने तो यह मगरे २०० वर्ष पहले ही छोड़ दिए , एक वर्ष तो तुम भी इन्हें छोड़कर उसे मातृभूमि की बातें सुनाओ |'

यदि कभी जोधपुर जाने का काम पड़े , तो महाराजा से आरज करना , कि आपका सेवक आपकी आज्ञा का सदियों तक पालन करता रहेगा | धरती बदल जाएगी , आसमान बदल जाएगा , इतिहास, काल और इंसान बदल जायेगा ; लेकिन आपका सेवक दुर्गा आपसे और आपकी आज्ञा से कभी नहीं बदलेगा | प्रलय के बाद भी उनकी आज्ञा बिना मैं मारवाड़ में एक कदम भी नहीं रखूँगा | यदि भगवान् न करे पर अजीत सिंह की तरह विपत्ति उन पर आ जाय , वे छोटे हों , तो कहना - आधी रात को भी याद करना , वह पैरों में जूतियाँ भी नहीं पहनेगा और दौड़ता हुआ चला आएगा |

और हाँ ! मैं तो भूल ही गया | एक बात और भी करना | यदि कर्तव्य की राह पर मिटने वालों के कभी मेले लगें , तो उन्हें भी कहना कि तुम्हारी महान परम्पराओं कि सच्ची राह पर ईमानदारी से मर मिटने वाला तुम्हारा ही एक अदना भाई क्षिप्रा के तीर पड़ा है | यदि ऐसे मेले पीपलून के पास पहाड़ियों में हलदेश्वर के पास लगे , तब उन पहाड़ों की प्रत्येक गुफा और उनका प्रत्येक पत्थर यही कहेगा - इन खोहों और पगडंडियों पर कभी दुर्गादास भी चला था , इन्ही रुंखों (पेड़ों) की छाँव में बैठकर वह पसीना पोंछा करता था , इन मैदानों और जंगलों में कबिओ दुर्गादास के घोड़े चरा करते थे |'
यदि कभी क्षत्रिय जाति का कोई देशभक्त संगठन हो, तो वहां कहना - ' इस संगठन के दुर्गादास जीवन भर तरसता रहा पर सफल नहीं हुआ और आप लोगों के लिए अप्रत्याशित सफलता पर उसने हार्दिक बधाईयाँ भेजी है |' यदि कौम के बन्दे कभी जंगल जंगल छाने , तो मुझे भी सूचना भेजना - ' मेरे बंधू , दुर्गादास , लौट के आ रे , लौट के आ ' | मैं उन कौम के कुशल कारीगरों के साथ सहयोगी और सामूहिक जीवन व्यतीत करना चाहता हूँ | एक बार फिर जंगल-जंगल भटकना चाहता हूँ , घर घर दीप जलना चाहता हूँ , गांव गांव और नगर-नगर में जाकर इस सत्य को कहना चाहता हूँ , कि यह कौम कभी मिटने न पायेगी और ठोकर लगने पर हर बार उठती जाएगी |

पथिक ! तुम रो रहे हो | आंसू मत बहाओ | तुम्हारी आँखों में तो दृढ प्रतिज्ञा के लाल डोरे दिखाई दे रहे थे | मैंने तो तुम्हे बदला लेने की आग में झुलसते देखा है और इसीलिए आज दौ सौ वर्ष बाद मैं अपनी समाधि से पहली बार जागकर कुछ कह पाया हूँ | हिम्मत रखो , बहो मत | तुम्हारे जैसे व्यक्ति से हिम्मत की उम्मीद करता हूँ |
बाबा ! दया करो ! मुझे लज्जित न करो - दया करो , प्रशंसा लज्जित हो रही है | उसे उपयुक्त पात्र चाहिए | मैं तुमसे प्रेरणा की भीख मांगने आया हूँ | मुझे भिक्षा दो | मेरी आँखों में दृढ प्रतिज्ञा कहाँ है ? वे आँखें तो फूट चुकी है | अब तो मैं अन्धा हो चूका हूँ और बदला भी मुझसे ही लिया जा रहा है | यह बदले की आग नहीं , जिसमे मैं जला जा रहा हूँ , यह तो मेरी संघर्ष हीनता जल रही है , तुम्हारे नेत्रों की रोषाग्नि से | मैं तुमसे प्रेरणा की भीख मांगने आया हूँ , मुझे भिक्षा दो |

मुझे भिक्षा दो , संतान -परम्परा की , उस कर्तव्य बुद्धि की जिससे मैं माँ दूध की लाज रख सकूँ | मुझमे धरती के प्रति रागात्मक सम्बन्ध का वह मोह उत्पन्न करो , जिसे मैं धरती के सुहाग की लाज रख सकूँ | मुझे उस अन्न की भिक्षा दो , जिससे मैं अन्न की लाज रख सकूँ | कर्तव्य पालन के मार्ग में अपने विश्वासों के लिए जीने की वह निर्ममता सिखा दो, जो स्वयं जलकर और को प्रकाश दे जिससे मैं नमक की लाज रख सकूँ | छलनाएँ और लालच मुझे मेरे मार्ग से विचलित करने का प्रयास करते है , इसलिए मुझे दे सको तो उस चरित्र की भिक्षा दो , जो तपस्वियों के तप की लाज रख सके | मुझे भक्ति दो| तुम्हारी स्वामिभक्ति मेरे भीतर सोये हुए भगवान् को जगाएगी |

टूट जावूँ पर झुकूं नहीं | हार जावूँ पर आँख में आंसू न बहाऊं | गिर जाऊं पर अपमान का बदला लेने के लिए बार-बार उठता जाऊं | मुझे उस स्वाभिमान कि भिक्षा दो , जिससे मैं समाज के लिए गौरवपूर्ण मर सकूँ |
महान दुर्गादास ! क्या तुम दानवीर भी हो ?
उसका घोडा मुडा |
मेरे समीप आ गया |
अभय मुद्रा में उसका हाथ उठा |

सदियों के बाद उसके होठों के बाँध से मुस्कराहट फूट निकली | मेरे जैसे निष्क्रिय , संघर्षविहीन और गौरवविहीन संतान को देखकर भी उसे शर्म अनुभव नहीं हुई | उसने मुझे इच्छित वस्तु दी |
उसने दानवीरों के दान की लाज रखी |

मैं धन्य हो गया | मेरा मस्तक श्रद्धा से उसके पावन चरणों में झुक गया | आँखों से भागीरथी की पावन धारा बहती रही | बहुत देर तक एक बार फिर उस महापुरुष को देखने के लिए आँखे उठी |
न घोडा था |
न घुड़सवार |

न जाने किस प्रकार दुनियां में वह खो गया , और मैं जैसे आया था वैसे अकेला रह गया |
सामने दिखाई दे रही - छत्री
महान वीर दुर्गादास का चिर उपेक्षित -स्मारक
जिसके चरणों में मन्दाक्रान्ता छंद की भांति बह रही थी - क्षिप्रा
चरण प्रक्षालन करती हुई सी |

पुज्य श्री तनसिंह जी ।

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